यह सवाल बहुत अहम है, लेकिन इसकी सच्चाई यह है कि भारत में “पहाड़” या “हिल” की कोई एक समान, फिक्स ऊँचाई (fixed minimum height) तय नहीं की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली से जुड़े मामलों में साफ कहा है कि:
- पहाड़ को केवल मीटर या फीट में नापकर परिभाषित नहीं किया जा सकता।
- अरावली जैसी पर्वतमाला की पहचान उसकी भू-वैज्ञानिक संरचना (geological formation), प्राकृतिक निरंतरता (natural continuity), और ऐतिहासिक रिकॉर्ड से होती है।
- केवल यह कह देना कि “इतनी ऊँचाई से कम है इसलिए पहाड़ नहीं है” — कानूनी रूप से गलत और भ्रामक है।
राज्य सरकारों द्वारा तय की गई ऊँचाइयाँ (जो विवाद का कारण बनीं)
- कुछ राज्यों/विभागों ने सुविधा के लिए 100 मीटर, 200 मीटर या 300 मीटर जैसी सीमाएँ तय करने की कोशिश की।
- सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे प्रयासों पर आपत्ति जताई और कहा कि
👉 मनमानी ऊँचाई तय करके अरावली को खत्म नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का मुख्य सिद्धांत
“अगर कोई भूमि अरावली पर्वतमाला का हिस्सा है,
तो उसकी ऊँचाई कम होने से वह अरावली नहीं रह जाती।”
यानि:
- खनन करके पहाड़ की ऊँचाई कम कर दी जाए
- फिर कहा जाए कि अब यह पहाड़ नहीं है
— यह तर्क सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया है।
इस भ्रम का नुकसान
इस “minimum height” वाले भ्रम की वजह से:
- पहले पहाड़ काटे जाते हैं
- फिर कहा जाता है कि अब यहाँ पहाड़ है ही नहीं
- और फिर कंस्ट्रक्शन व माइनिंग को वैध ठहराने की कोशिश होती है
यही कारण है कि अरावली लगातार खत्म होती जा रही है, और उसका असर आज:
- AQI
- पानी की कमी
- बढ़ती गर्मी
- जलवायु असंतुलन
के रूप में दिख रहा है।
निष्कर्ष (इस बिंदु पर)
अरावली को बचाने के लिए यह समझना जरूरी है कि:
- पहाड़ की पहचान ऊँचाई से नहीं, प्रकृति से होती है।
- ऊँचाई तय करना नहीं, अरावली क्षेत्र में हर प्रकार की विनाशकारी गतिविधि रोकना असली समाधान है।
