बिल्डर को फायर NOC (No Objection Certificate) कैसे और किस आधार पर दे देते हैं?

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जब फायर डिपार्टमेंट के पास खुद ऊंची मंजिलों (Multistories) तक पहुंचने वाले अत्याधुनिक संसाधन या पर्याप्त हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म नहीं होते, तो वे बिल्डर को फायर NOC (No Objection Certificate) कैसे और किस आधार पर दे देते हैं?

फायर एनओसी मिलने और फायर डिपार्टमेंट की इस कार्यप्रणाली के पीछे का कानूनी और तकनीकी गणित इस प्रकार है:

1. “बिल्डिंग का खुद सक्षम होना” (In-built Fire Fighting System)

कानूनन, फायर डिपार्टमेंट बिल्डर को NOC इस शर्त और जांच पर देता है कि आग लगने पर सोसाइटी का अपना सिस्टम उसे काबू करेगा, न कि फायर ब्रिगेड की गाड़ियां।

  • नियम (National Building Code) के अनुसार, किसी भी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग को खुद में एक “फायर फाइटर” की तरह डिजाइन होना चाहिए। [1]
  • बिल्डर को NOC देने से पहले विभाग यह चेक करता है कि सोसाइटी के अंदर:
    • फायर हाइड्रेंट और होज रील (Hose Reels) हर फ्लोर पर काम कर रहे हैं या नहीं।
    • रूफटॉप वॉटर टैंक और हाई-प्रेशर फायर पंप लगे हैं या नहीं, जो पानी को 15वीं या 20वीं मंजिल तक पहुंचा सकें।
    • ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर सिस्टम और स्मोक डिटेक्टर्स चालू हालत में हैं या नहीं। [1, 2]

फायर डिपार्टमेंट का तर्क यह होता है कि उनके पास भले ही 100 मीटर ऊंची लैडर (सीढ़ी) न हो, लेकिन अगर बिल्डिंग का अपना इंटरनल सिस्टम दुरुस्त है, तो आग पर वहीं के उपकरणों से तुरंत काबू पाया जा सकता है。 [1, 2]

2. कागजी अप्रूवल और भ्रष्टाचार (Paper Compliance)

जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब बिल्डिंग बनकर तैयार होती है, तब बिल्डर NOC लेने के लिए अस्थाई तौर पर सारे उपकरण (पंप, स्प्रिंकलर, अलार्म) चालू करके दिखा देता है। विभाग के अधिकारी कागजों और उस वक्त के ट्रेल को देखकर NOC साइन कर देते हैं। एक बार बिल्डर को Occupancy Certificate (OC) मिल गया, तो वह मेंटेनेंस को नजरअंदाज कर देता है या आरडब्ल्यूए (RWA) को खराब सिस्टम सौंपकर निकल जाता है। [1, 2]

3. संसाधनों की भारी कमी (Infrastructure Deficit)

यह एक कड़वा सच है कि भारत में अधिकांश शहरों के फायर विभागों के पास 15-20 मंजिल से ऊपर (जैसे 50 मीटर से अधिक) के लिए पर्याप्त हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म या स्काईलिफ्ट नहीं हैं। विदेशी और बेहद महंगे उपकरण खरीदने की प्रक्रिया सरकारी फाइलों और बजट की कमी के कारण सालों-साल लटकी रहती है। इसीलिए, वे पूरी तरह से बिल्डिंग के खुद के फायर सेफ्टी इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर होते हैं। [1, 2, 3, 4]

फिर फायर विभाग सोसायटियों पर केस क्यों कर रहा है?

हाल के दिनों में (जैसे गाजियाबाद और नोएडा की सोसायटियों में) फायर विभाग जो कोर्ट केस या नोटिस भेज रहा है, वह इसी वजह से है। जांच में यह पाया जाता है कि: [1, 2]

  • बिल्डर ने NOC लेते वक्त जो वादे किए थे, वे सिस्टम अब कबाड़ या बंद पड़े हैं।
  • हुकअप पॉइंट खराब हैं, फायर लिफ्ट काम नहीं कर रही हैं, या पाइपलाइनों में पानी का प्रेशर ही नहीं है। [1, 2, 3]

चूंकि विभाग के पास खुद ऊंची मंजिलों तक सीधे पहुंचने के साधन सीमित हैं, इसलिए उनका पूरा जोर इस बात पर होता है कि सोसायटियां अपने आंतरिक सिस्टम को हर हाल में चालू रखें ताकि कोई बड़ा हादसा न हो।

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